
As an Amazon Associate and affiliate partner, Menrva Books earns from qualifying purchases. Learn more
यह किताब मैंने नहीं लिखी... बस अपने आप उतरती गई - मेरी उन रातों से, जब नींद नहीं आती थी और दिल किसी को समझाना चाहता था । उन सुबह से, जब ज़िंदगी एक मुस्कुराहट मांगती थी, मैं खुद से नज़रें चुराकर शीशे के सामने खड़ा होता था । ये किताब उनकी है - जो थक चुके हैं, फिर भी मुस्कुरा रहे हैं । जो टूट चुके हैं, पर बिखरना नहीं चाहते । "तुम अपने हो" - ये कोई सलाह नहीं, कोई प्रवचन नहीं, बस एक दोस्त की चुपचाप कही बात है । हमने अपने भीतर इतने सवाल भर लिए हैं कि अब जवाब ढूंढने की हिम्मत नहीं होती । हमने रिश्तों की भीड़ में खुद को खो दिया है, अब अकेले में आवाज़ें पीछा करती हैं । यह किताब तुम्हारे लिए है - तुम कभी बेवजह रोए हो । तुम कभी खुद से कहे हो? "अब और नहीं होता"… फिर भी उठकर काम पर गए हो । यह किताब तुम्हारे लिए है - अगर तुमने कभी महसूस किया हो कि तुम्हारी खामोशी चीख रही है, कोई सुन नहीं रहा । इस किताब को लिखते समय मैंने कोई पात्र गढ़े नहीं । मैंने लोगों को देखा - तुम्हें, खुद को, आस-पास के उन चेहरों को, जो रोज़ मुस्कुराते हैं भीतर कुछ टूटा-सा छिपाए रहते हैं । विक्रान्त, अमिता और बाबू जैसे पात्र हमारे ही भीतर के हिस्से हैं । विक्रान्त की संवेदनशीलता, अमिता की जद्दोजहद, बाबू की सादगी - ये हम सबमें कहीं न कहीं मौजूद है । मैं चाहता हूँ जब तुम इस किताब के पन्ने पलटो, तब तुम खुद को पढ़ो । तुम ये महसूस करो किसी ने तुम्हारे भीतर की आवाज़ सुनी है, उसे शब्द दिए हैं । अगर कहीं भी, किसी भी पन्ने पर, तुम्हें ऐसा लगे कि “हाँ, ये मैं ही हूँ” - तो समझो, ये किताब पूरी हो गई । अंत में कहना है... ज़िंदगी हर किसी को आवाज़ नहीं देती, कुछ खामोशियों में ही समझना पड़ता है । अगर तुम अब भी समझ रहे हो - तो शुक्रिया । “तुम अपने हो” । - डॉ ऋत्विज तिवारी
Page Count:
61
Publication Date:
2025-08-20
Publisher:
Booksclinic Publishing
ISBN-10:
9372543020
ISBN-13:
9789372543025
No comments yet. Be the first to share your thoughts!