
यह नाटक सामाजिक परिवर्तन की दिशा में काम करता है लगभग 40 साल पहले लिखे गए इस नाटक की प्रासंगिकता आज भी बरकरार बनी हुई हैयह नाटक सोचने पर मजबूर करता है की सामाजिक परिवर्तन की जो दिशा हमने पकड़ी है क्या वह सही है या फिर मात्र एक भटकाव है।
Page Count:
104
Publication Date:
2005-01-01
Publisher:
Vani Prakashan
ISBN-10:
8181433149
ISBN-13:
9788181433145
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