
कुँवर नारायण, हिन्दी कविता के ही नहीं, बल्कि समूचे भारतीय साहित्य की बीसवीं शताब्दी के अग्रणी एवं अन्यतम लेखक हैं। जीवन विवेक एवं नैतिक चेतना से सम्पन्न उनकी सजग आत्मीय द्रष्टि ने हिन्दी कविता के वितान में कुछ ऐसा बड़ा यथार्थ रचा है, जिसकी शिनाख़्त आने वाले समयों में बार-बार अपने पुनर्पाठ के लिए प्रेरित करती रहेगी। 'पचास कविताएँ नयी सदी के लिए चयन' श्रृंखला में यह देखना प्रीतिकर और प्रासंगिक है कि अपने जीवन के आठवें दशक में कुँवर नारायण पूर्णतया सृजनरत रहते हुए संवेदनाओं की ऐसी ठोस ज़मीन पर खड़े नज़र आते हैं, जहाँ से उनकी हिस्सेदारी एक ऐसे परिपक्व चिन्तक की बनती है, जिसमें समय और स्थान, जीवन और विचार, राजनीति और समाज तथा संवेदनाएँ और जिजीविषा पूरी मनुष्यता के साथ आज भी सक्रिय हैं। एक शास्त्रीय अनुशासन में यदि कुँवर नारायण की मनुष्यता को प्रतिबिम्बित करने वाली आवाज का लेखा-जोखा बनाया जाये, तो उसमें हमारे समय में व्यक्ति के आत्मसंघर्ष, उसके आत्मबोध और नैतिक ज़िम्मेदारी के सूक्ष्मतम ब्यौरे दर्ज़ मिलेंगे।
Page Count:
0
Publication Date:
1905-07-03
Publisher:
Vani Prakashan
ISBN-10:
9350007185
ISBN-13:
9789350007181
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