
मन से परछाईं दूर नहीं हो पाती; लेकिन जब जीवन की देहलीज पर साँझ दस्तक देती है; तब जीवन का अर्थ समझ आने लगता है। अपनी जिंदगी की शाम में कैफ भोपाली जीवन और उससे जुड़ी परछाईं इन दोनों का अर्थ इन पंक्तियों में समझा गए हैं— जिंदगी शायद इसी का नाम है; दूरियाँ; मजबूरियाँ; तन्हाइयाँ। क्या यही होती है शामे इंतजार; आहटें; घबराहटें; परछाइयाँ। जीवन की साँझ में ये परछाइयाँ हमें अपने अस्तित्व का स्मरण करा देती हैं। नंदकिशोर कहते हैं— सूरज ढला तो कद से ऊँचे हो गए साये; कभी पैरों से रौंदी थीं यही परछाइयाँ हमने। सोचता हूँ; ये परछाइयाँ साँझ होते-होते क्यों लंबी होने लगती हैं? इसलिए कि ये ढल जाने की बाट जोहती हैं। इनके रिश्ते ऊषा से नहीं होते; भोर से नहीं होते; सुबह के आँचल में छुपी आशाओं से नहीं होते। इनके रिश्ते उस रात से होते हैं; जिसकी प्रकृति से परछाईं की प्रकृति मिलती है। दोनों स्याह होते हैं; दोनों भटकाते हैं और दोनों उजास की पराजय में अपनी जय के उत्सव रचते हैं। रात का उत्सव अँधेरा है और परछाईं का पर्व वह ढलती साँझ है; जिसके आगमन पर उजास की धड़कनें मंद होने लगती हैं। परछाईं छलना है। उसकी परिणति अंधकार है। वह अपना उत्तराधिकार रात को सौंपती है। इसलिए भले परछाईं कुछ देर हमारे साथ-साथ चलकर हमें अपने साथ होने का आभास कराए; वह आश्वस्ति नहीं है; विश्वास नहीं है। —इसी संग्रह से
Page Count:
184
Publication Date:
2020-01-02
Publisher:
Prabhat Prakashan
ISBN-10:
9388984021
ISBN-13:
9789388984027
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