
सैद्धांतिक और व्यावहारिक आलोचना के संतुलन की जो परंपरा आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने शुरू की थी वह विचारधारा के दबाव अथवा रूपवादी प्रयास के कारण दूसरी राह पर चली गयी थी। बाद के आलोचक शुक्लजी की उस नसीहत को भूल गये कि साहित्य की अपनी ‘मूल सत्ता’ होती है। सभ्यता ऊपरी आवरण है जिसे समझना तो ज़रूरी है मगर उसी में डूब जाना ठीक नहीं है। आलोचना को अंततः साहित्य के सवालों और समस्याओं से जुड़ना है इसलिए साहित्य का मूलाधार अच रहना चाहिए। दूसरी परंपरा में होने के बावजूद मैनेजर पाण्डेय ने साहित्य के मूल स्वरूप को आत्मसात कर उसके क्रमबद्ध विवेचन का प्रयास किया है।
Page Count:
220
Publication Date:
2016-01-01
Publisher:
Vani Prakashan
ISBN-10:
9350728443
ISBN-13:
9789350728444
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